मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाती हूँ — एक बिल्कुल आम लड़की की, जो अपनी ज़िंदगी में बस अपने छोटे-छोटे सपनों में उलझी हुई थी। मैं एक टॉप-टियर मीडिया नौकरी में थी — दिनभर काम, फोन, टारगेट, मीटिंग्स, थकान… और बस यही समझती थी कि यही ज़िंदगी है। कभी सोचा ही नहीं था कि मेरी खपत, मेरी ज़रूरतें, मेरे फैसले… इस धरती पर क्या असर डाल रहे हैं।
लेकिन फिर मेरी ज़िंदगी में आचार्य प्रशांत जी आए।
उनसे सुनकर, उनसे सीखकर, मेरी आँखें खुलीं। समझ में आया कि हम सिर्फ़ अपने छोटे घेरे में नहीं जी रहे, हम सबका जुड़ाव पूरी धरती से है। हमारी संख्या, हमारी ज़िम्मेदारियाँ, हमारी आदतें — सब मिलकर इस धरती को या तो बचा सकते हैं, या बर्बाद कर सकते हैं।
जनसंख्या: केवल आंकड़े नहीं, एक कड़वा सच
सुनो —
✅ हर साल भारत में करीब 2.5 करोड़ लोग बढ़ जाते हैं।
✅ भारत की आबादी दुनिया में सबसे ज़्यादा हो चुकी है — 1.4 अरब!
✅ लेकिन हमारे पास न ज़्यादा ज़मीन बढ़ी, न पानी बढ़ा, न जंगल, न हवा।
मतलब क्या? लोग बढ़ते जा रहे हैं, संसाधन वही के वही।
हमारी ज़्यादा आबादी का सीधा मतलब है:
- ज़्यादा खेतों पर दबाव → ज़मीन बंजर हो रही है।
- ज़्यादा पानी की माँग → नदियाँ और भूजल सूख रहा है।
- ज़्यादा बिजली, पेट्रोल, गैस की ज़रूरत → कोयला और तेल की खुदाई, जंगलों का कटना।
- ज़्यादा कचरा → नदियाँ, समंदर, जमीन सब गंदा हो रहे हैं।
एक घर का उदाहरण…
सोचो तुम्हारे पास एक छोटा-सा घर है — बस दो कमरे, एक रसोई, एक बाथरूम।
शुरू में वहाँ चार लोग रहते थे।
सबके लिए जगह थी, आराम से सोते थे, खाते थे, नहाते थे, पानी-बिजली भी ठीक चलती थी। अब अचानक उस घर में बीस लोग रहने लगें! क्या होगा?
- बिस्तर कम पड़ेंगे, लोग ज़मीन पर सोएंगे।
- बाथरूम के लिए लाइन लगेगी, झगड़े होंगे।
- रसोई में बर्तन ज्यादा, गैस कम — खाना बनाने में दिक्कत।
- पानी की टंकी जल्दी खाली, बिजली का बिल आसमान पर।
- एक-दूसरे से चिढ़, तनाव, लड़ाई-झगड़े।
यही हो रहा है हमारी गली, हमारे शहर, हमारे देश और इस पूरी पृथ्वी के साथ।
अब सिर्फ़ संख्या नहीं, खपत की भी बात…
अब सोचो, उस छोटे-से घर में भले चार लोग ही हों,
लेकिन अगर वे रोज़ 10-10 बाल्टी पानी बहाएं, हर लाइट-पंखा ऑन छोड़ दें, खाना फेंक दें — तब भी क्या हाल होगा?
पानी, बिजली, संसाधन सब बर्बाद होंगे, घर में संकट ही रहेगा।
तो, सिर्फ़ लोगों की संख्या ही वजह नहीं है, उनकी खपत (consumption) की आदतें भी बहुत बड़ी वजह हैं।
मैंने आचार्य जी से क्या सीखा…
किसी ने मुझे ये नहीं सिखाया था — न स्कूल में, न घर में, न नौकरी में — कि धरती पर मेरा भी बोझ है।
आचार्य प्रशांत जी ने बताया कि समस्या सिर्फ़ बाहर नहीं, हमारे भीतर है।
हम लालच में जीते हैं — और जब हमारे लालच मिलते हैं, तब ये पूरी व्यवस्था गड़बड़ा जाती है।
“हमें ज़्यादा चाहिए, हमें बेहतर चाहिए, हमें सबकुछ चाहिए…” — बस इसी दौड़ में धरती का दम घुट रहा है।
क्या जनसंख्या घटाना ही हर संकट का समाधान है?

नहीं! देखो, अगर हम ये सोचें कि बस जनसंख्या कम हो जाए, तभी सब ठीक होगा, तो ये अधूरी बात होगी। क्यों? क्योंकि अगर एक आदमी ही 10 लोगों जितना खाए, पीए, खर्च करे, बर्बाद करे, तो भले ही जनसंख्या कम हो, संसाधन फिर भी खत्म हो जाएंगे।
उदाहरण:
मान लो, एक अमीर देश (जहाँ कम लोग रहते हैं) का हर व्यक्ति रोज़ 5-6 कारें चलाता है, ढेर सारी बिजली खर्च करता है, बेवजह सामान खरीदता है, और हर साल टनों प्लास्टिक फेंकता है — वहाँ की कम आबादी का क्या फायदा?
दूसरी ओर, अगर एक गरीब देश (जहाँ लोग ज्यादा हैं) का हर व्यक्ति सादगी से जीता है, खाने-पीने और सामान की बरबादी नहीं करता, सिर्फ़ ज़रूरत भर इस्तेमाल करता है, तो वहाँ की बड़ी आबादी भी पर्यावरण पर उतना भारी असर नहीं डालेगी।
आचार्य जी यही सिखाते हैं:
“बाहर की समस्या को मत देखो, पहले अपने भीतर देखो। बदलाव की शुरुआत अपने से करो।”
क्या करना ज़रूरी है?

✅ लड़कियों को शिक्षा — पढ़ी-लिखी लड़की अपना परिवार समझदारी से बनाती है।
✅ परिवार नियोजन — हर घर को समझना होगा कि ज़्यादा बच्चे कोई ज़रूरी “संपत्ति” नहीं, बल्कि बोझ बन सकते हैं।
✅ अपनी खपत पर ध्यान — जरूरत से ज़्यादा खरीदना, खाना, इस्तेमाल करना — यही असली लूट है।
✅ सरकार और नीतियाँ — सरकारों को जनसंख्या पर ईमानदारी से काम करना होगा, वोटबैंक की चिंता छोड़कर।
आखिर में, मेरी अपनी बात…
मैं भी पहले यही सोचती थी — मेरी ज़िंदगी, मेरी परेशानियाँ, मेरी खुशियाँ… इससे बाहर क्या है?
लेकिन आज जब समझ में आता है कि मेरी ज़िंदगी का हर छोटा फैसला — कितना खाऊँ, क्या पहनूँ, क्या खरीदूँ, किसे सपोर्ट करूँ — इस धरती पर असर डालता है, तो दिल काँप जाता है।
मैंने आचार्य जी से ही सीखा कि हम सबकी ज़िम्मेदारी है, और जब हम अपनी ज़िम्मेदारी नहीं उठाते, तभी दुनिया में तबाही आती है। किसी और के सुधरने का इंतज़ार मत करो — खुद से शुरुआत करो। यही असली जागरूकता है। आओ, हम सब मिलकर अपनी धरती का, अपने संसाधनों का, और अपने भविष्य का सम्मान करें।
आचार्य प्रशांत जी कहते हैं, “बाहर की समस्या को मत देखो, पहले भीतर देखो।”

इसका मतलब क्या? मतलब ये कि हम बाहर की चीजों को दोष देने लगते हैं — सरकार, दुनिया, जनसंख्या, सिस्टम।
लेकिन असली बदलाव कहाँ से शुरू होता है? खुद से।
- क्या मैं जरूरत से ज़्यादा खरीद रहा हूँ?
- क्या मैं खाने की बरबादी कर रहा हूँ?
- क्या मैं हर साल नया सामान, नए कपड़े, नया फोन लेने की लालच में जी रहा हूँ?
- क्या मैं सादगी, किफ़ायत और ज़िम्मेदारी से जी रहा हूँ या सिर्फ़ भोग में डूबा हूँ?
अगर मैं अपनी आदतें नहीं बदलूँगा, तो भले ही दुनिया में लोग कम हों — नुकसान होता रहेगा।