श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
“तुम ऐसे लोगों के लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं हैं, और ज्ञानियों की तरह बातें कर रहे हो। किंतु ज्ञानी न तो मृत (जिसमें प्राण नहीं हैं) के लिए शोक करते हैं, और न ही जीवित (जिसमें प्राण हैं) के लिए।”
शोक करना सही है?
“इस श्लोक का अर्थ जो मैं समझ पाई हूँ आचार्य प्रशांत जी की शिक्षाओं से, वो यह है…”
कि शोक करना केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह आत्मा की सच्ची पहचान न होने का प्रमाण है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं — “तुम ऐसे लोगों के लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य ही नहीं हैं, और ऊपर से ज्ञानी बनने की बातें कर रहे हो।” यदि तुम सच में ज्ञानी होते, तो तुम समझ पाते कि आत्मा कभी मरती ही नहीं। जो न मरा है, उसके लिए शोक कैसा?
आचार्य जी के अनुसार, यह श्लोक केवल युद्ध-स्थिति की बात नहीं कर रहा, यह हमारे जीवन की हर उस स्थिति पर लागू होता है जहाँ हम मोह, रिश्तों या मृत्यु के नाम पर टूट जाते हैं। वे कहते हैं —
“जहाँ मोह है, वहाँ ज्ञान नहीं हो सकता। और जहाँ ज्ञान है, वहाँ शोक नहीं टिकता।”
श्रीकृष्ण के इन शब्दों में केवल सांत्वना नहीं है, बल्कि एक सीधा प्रश्न है – क्या तुम्हारा शोक वास्तव में प्रेम है या केवल अपने-अपने से जुड़ाव का नाम है?
यह श्लोक हमें आमंत्रण देता है —
अपने भीतर झाँकने का,
अपने शोक की जड़ों को समझने का,
और फिर उस आत्मा को जानने का
जो जन्म और मृत्यु से परे है।
शोक की अनुपयुक्तता पर गहरी चोट:
आचार्य जी कहते हैं कि भगवान यहाँ अर्जुन को केवल तसल्ली नहीं दे रहे, बल्कि गहराई से उसके शोक करने के अधिकार पर ही सवाल उठा रहे हैं। “तुम शोक कर रहे हो उन लोगों के लिए जिनके लिए शोक करना ही एक अज्ञानता है। ”अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने प्रियजनों को देखकर भावनात्मक हो गया है, पर आचार्य जी कहते हैं — “प्रेम के नाम पर जो मोह है, वह दरअसल अहंकार का एक रूप है।” अर्जुन का शोक अपने रिश्तों को लेकर है, पर वह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पा रहा।
दिखावा ज्ञान का:
यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह भी बता रहे हैं कि वह ज्ञान की बातें तो कर रहा है – ‘मैं युद्ध क्यों करूं, यह पाप है, ये मेरे बंधु हैं’ – पर यह वास्तविक ज्ञान नहीं, बल्कि ज्ञान का दिखावा है। आचार्य जी कहते हैं: “पंडित वही होता है जो आत्मा को जानता है। जो जानता है कि जीवन और मृत्यु आत्मा को नहीं छूते, वही किसी के जाने या रहने पर शोक नहीं करता।” ‘गतासून’ यानी जिनमें प्राण नहीं, और ‘अगतासून’ यानी जिनमें प्राण हैं – यह बात श्रीकृष्ण शरीर की दृष्टि से नहीं, आत्मा की दृष्टि से कर रहे हैं।
आचार्य जी कहते हैं: “जो आत्मा को जानता है, उसे ये शरीर का आना-जाना प्रभावित नहीं करता। आत्मा न कभी आती है, न जाती है। तो शोक कैसा?”
अर्जुन का मोह: युद्ध से पलायन नहीं, अहंकार का विस्फोट:
अर्जुन की दुविधा किसी करुणा से नहीं उपजी है। आचार्य जी साफ कहते हैं: “ये युद्ध से पलायन नहीं है, ये आत्मा की पहचान की कमी है। अर्जुन यह सोच ही नहीं पा रहा कि युद्ध का केंद्र कौन है – अहम् या धर्म।”
मुख्य सीख – ब्लॉग के लिए बिंदु:
- शोक करना क्या वास्तव में प्रेम है या अज्ञानता?
- ज्ञान का मुखौटा पहनकर क्या हम मोह को छिपाते हैं?
- क्या हम मृत्यु और जीवन की सच्चाई को जानते हैं या केवल शरीर से जुड़ाव तक सीमित हैं?
- पांडित्य का अर्थ क्या केवल शास्त्र-ज्ञान है या आत्मा का बोध?
- क्या हम सच में “धार्मिक” निर्णय ले रहे होते हैं, या हमारी भावुकता हमें रोकती है?