– वनों की कटाई और हमारी आत्मा की कटाई
आज मैं अपना नया ब्लॉग लिख रही हूँ जिसका विषय है — “क्यों चीखते हैं पेड़-पौधे भी?“
आइए, इसे दिल से समझते हैं।
जब पेड़ कटते हैं, तो केवल लकड़ी नहीं गिरती__

सोचिए, अगर आपके शरीर से धीरे-धीरे एक-एक अंग काटा जाए, तो क्या आप चुप रहेंगे? नहीं ना?
ठीक वैसे ही, जब एक पेड़ कटता है, तो वह भी अपनी तरह से चिल्लाता है — केवल हम सुन नहीं पाते।
वन केवल हरियाली नहीं हैं, वे जीवन के स्तंभ हैं। वहाँ अनगिनत जीव रहते हैं, धरती का तापमान संतुलित होता है, नदियों को पानी मिलता है, और हवा शुद्ध होती है।
पर आज?
हम विकास के नाम पर जंगलों को बेरहमी से काट रहे हैं, जैसे किसी माँ की गोद उजाड़ दी जाए।
हैदराबाद की ताजा घटना: धरती की चीख
मार्च 2025 के अंत में, हैदराबाद के कान्चा गचिबोवली क्षेत्र में लगभग 40,000 पेड़ काट दिए गए।
यह क्षेत्र न केवल जैवविविधता का गढ़ था, बल्कि पूरे शहर को शुद्ध हवा और ठंडक देने का काम करता था।
मोर, हिरण, साही, और सैकड़ों पक्षियों का बसेरा उजड़ गया।

छात्रों और नागरिकों ने इसका विरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर काम रुकवाया, लेकिन सवाल अब भी खड़ा है — क्या उजड़ी प्रकृति वापस लाई जा सकती है?
राज्य सरकार ने वादा किया कि वहाँ “इको पार्क” बनेगा। लेकिन जो प्राकृतिक जंगल खुद में एक सम्पूर्ण इकोसिस्टम था, क्या वह मनुष्य द्वारा बनाया हुआ पार्क बन सकता है?
सवाल हम सबके सामने है।
जब आत्मा से संबंध टूटता है

आज का मनुष्य अपने अस्तित्व को केवल शरीर तक सीमित कर बैठा है।
खाना, रहना, कमाना — बस यही जीवन बन गया है।
हमने प्रकृति से, अपनी आत्मा से, और अपने मूल धर्म से नाता तोड़ लिया है।
इसीलिए पेड़ कटते हैं और हमें फर्क नहीं पड़ता।
नदियाँ मरती हैं और हमें दुख नहीं होता।
पशु कराहते हैं और हम अनसुना कर देते हैं।
समाधान कहाँ है? भगवद गीता में!
भगवद गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, वह जीवन का विज्ञान है, धरती से, आत्मा से, और कर्तव्य से जुड़ने का मंत्र है।आज के दौर में, जब लोभ, अहंकार और अज्ञान ने हमारी आँखों पर पर्दा डाल दिया है, हमें भगवद गीता का प्रकाश चाहिए। और भगवद गीता को सही मायनों में समझने के लिए आचार्य प्रशांत जी से बेहतर कौन हो सकता है? वे तर्क, सत्य और गहन वैचारिकता के साथ गीता का अर्थ खोलते हैं। वे दिखाते हैं कि गीता कोई पुराने ज़माने की किताब नहीं है, बल्कि आज के हर छोटे बड़े निर्णय में मार्गदर्शक हो सकती है — चाहे वह पर्यावरण बचाने का हो या अपने जीवन को अर्थपूर्ण बनाने का।
आज जब हम केवल अपने छोटे-छोटे स्वार्थों में उलझे हैं, हमें गीता का विराट दृष्टिकोण चाहिए।
गीता कहती है:
“जो सारे प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है, वही सच्चा ज्ञानी है।“ अगर हम सचमुच गीता को समझ लें, तो न केवल हम खुद बदलेंगे, बल्कि धरती पर भी जीवन बचेगा।
आगे बढ़ने के कुछ कदम:
- वृक्षों को केवल साधन नहीं, सजग प्राणी समझें।
- वनों की रक्षा व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानें।
- अपने बच्चों को प्रकृति प्रेम सिखाएँ।
- खुद भगवद गीता का अध्ययन करें और दूसरों को भी प्रेरित करें।
अंतिम संदेश:
पेड़ कटना केवल लकड़ी खोना नहीं है,
यह आत्मा के एक हिस्से को खोना है।
और जब आत्मा कटती है, तो पूरा जीवन सूखने लगता है।
अब समय है —
धरती की पुकार सुनने का,
और गीता का संदेश अपने जीवन में उतारने का। 🙏

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